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नवयुवाओं सस्ती नहीं ये जिंदगी

नवयुवाओं सस्ती नहीं ये जिंदगी रोज अखबार पढ़ने की मेरी आदत साथ ही रोज़ टेलीविजन पर केवल खबरों को देखना …


नवयुवाओं सस्ती नहीं ये जिंदगी

नवयुवाओं सस्ती नहीं ये जिंदगी

रोज अखबार पढ़ने की मेरी आदत साथ ही रोज़ टेलीविजन पर केवल खबरों को देखना मुझे बहुत पसंद है एक दिन अखबार ना देखूं तो मन को शांति मिलती है । अरे ! यह क्या ? कल के अखबार में ही तो पढ़ा था की एक युवक-युवती जिनके रिश्ते को समाज और परिवार ने स्वीकार करने से मना कर दिया उन्होंने अपनी बेशकीमती जीवन को खत्म करना ही इस समस्या का समाधान समझा । आज फिर अखबार की सुर्खियों में पढ़ रही हूं कि जब परिवार वाले उनके प्यार भरे रिश्ते को नहीं माने तो लड़के ने खुद को फांसी लगा ली और लड़की उसी गम में खदान में कूद गई , वाकई दो दिन से एसी दुखद घटनाओं को पढ़कर मन व्याकुल हो उठा चाहे यह घटनाएं मेरे इलाके या शहर की नहीं थी या मेरा इनसे दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था परंतु इंसानियत के नाते मन दु:ख से भरा जा रहा था मन यही सोच रहा था कि क्या हुआ है , आजकल की नव युवा पीढ़ी को बात-बात में अपने जीवन को इतना सस्ता समझते हुए जीवन खत्म कर डाल देते हैं क्यों ? यह नहीं सोचते कि यह जीवन दिया हुआ उस प्रभु का है और जीवन देने वाले जो जरिया है वह मां- बाप है मां जो अपनी कोख में नौ माह सहेज कर अपने गर्भ को देख-देख कर खुश होती रहती है , उस मां का क्या सोचिए उसके लिए एक- एक पल कितना खुशनुमा होता है अपने गर्भ को देखते हुए अपने आने वाली संतान के लिए सपने संजोते हुए । मां की कोख नौ माह के बलिदानों का नतीजा है । क्या नहीं करना पड़ता है इन नौ माह के बीच में मां को , कितना सहेज कर रखना पड़ता है । कितना एक मां को एक-एक कदम पर सोच कर चलना पड़ता है कि कहीं कोई ठोकर ना लग जाए या कहीं कोई घटना ना हो जाए । पिता जो हर वक्त अपनी पत्नी का ख्याल रखता है सिर्फ इसलिए कि उसकी औलाद आने वाली है और खुश होता रहता है देख अपनी पत्नी को , वो हर एक वह खुशी देने की कोशिश करता है पत्नी को ताकि उसका संसार में आने वाला बच्चा स्वस्थ पैदा हो सके उसे किसी प्रकार की परेशानी ना हो मां-बाप के इस नौ माह के त्याग तपस्या बलिदानों का फल एक बच्चा होता है उनका । पर आज के जमाने की पीढ़ी क्या दे रही है बदले में अपने मां -बाप को ? अपने आप को खत्म करके आप अपने मां बाप को ही जैसे खत्म कर डालते हैं जीते जी उनके ऊपर उनके बच्चे के जाने का दु:ख उन्हें अधमरा सा कर देता है । सिर्फ नौ माह का बलिदान नहीं होता है उसके आगे की जिंदगी बच्चे के बढ़ने के साथ-साथ और भी मुश्किलों भरी हो जाती है बच्चे की शिक्षा , बच्चे की परवरिश , उसकी हर एक फरमाइश , का ध्यान उसके हर एक खर्चे के लिए तुरंत पिता कहीं ना कहीं से बंदोबस्त कर खुद को खपा कर करता है और बदले में क्या मिलता है उसे ? मां-बाप किसी लालच के वशीभूत होकर अपनी औलाद को नहीं पालते मां बाप बनना तो हर एक पति-पत्नी का सपना होता है नसीब वाले होते हैं जिनकी अपनी औलाद होती हैं । उस मां का क्या जिसने अपने आंचल में छुपा कर अपने बच्चे को नाजों से पालकर उसके बालिग होने तक बहुत प्यार दिया , अपने बच्चे की एक चोट पर मां रो पड़ती है बिफर पड़ती है कि मेरे बच्चे को लग गई क्या मां का प्यार मां का प्यार नहीं है ? क्या उसके प्यार की कोई कीमत नहीं है ? क्या उसके दिए प्यार , संस्कारों , बलिदान का अपनी औलाद के ऊपर कोई हक नहीं है उसके बदले में आजकल के नव युवा पीढ़ी अपने मां-बाप को क्या दे रहे हैं दुख सिर्फ उस लड़की के लिए या उस लड़के के लिए जिससे जुम्मे के जुम्मे मिले हुए कुछ महीने या कुछ वर्ष हुए हैं और जिसने आपको 21 बरस पाला उन मां-बाप के जज़्बातों का क्या ? बात-बात में आतुर हो उठते नवयुवा पीढ़ी मां बाप के एक शब्द पर भूचाल सा जैसे ला देते हैं मां बाप ही उनको सही शिक्षा देकर सही राह दिखाने की कोशिश करते हैं और उसी मां-बाप को अक्सर बच्चे अपना दुश्मन समझ बैठते हैं अपने प्यार का । बच्चों के लिए क्या सही है , क्या गलत है समाज के दायरे में रहते हुए समझाते हैं परंतु आजकल की युवा पीढ़ी मां-बाप के प्यार को नहीं समझ पाती है ना ही उनके समर्पण के प्रति दिल में कोई कद्र रहती है कद्र तो उस इंसान के लिए हो जाती है जिसके साथ वह अपने भविष्य के सपने संजोने लगते हैं चाहे फिर उसे समाज स्वीकार करें या ना करें और अगर इनके विरोध में कोई खड़ा हो जा रहा है तो अपनी जिंदगी को इतना सस्ता समझ ले रहे हैं कि खत्म करने में बिल्कुल नही हिचकिचा रहे । यह भी नहीं सोचते कि हम यदि चले जाएंगे इस दुनिया को छोड़ कर तो हमारे मां-बाप का क्या होगा वह मां-बाप जो हमें खिलाएं बिगर खा नहीं पाते , वह मां-बाप जो हम अगर थोड़ी देर से भी घर पहुंचे तो चिंताओं से भर उठते हैं कि हमारा बच्चा कहां गया । आज की नव युवा पीढ़ी को यह सुझाव देना चाहूंगी की जिंदगी सस्ती नहीं है और इस जिंदगी की कीमत बहुत अधिक है और यह जिंदगी मां बाप के जरिए मिली है जिसकी कीमत आप कभी उतार नहीं सकते हैं जिंदगी खत्म करने से पहले इस बेशकीमती जिंदगी की कीमत को पहचानो और साथ ही अपने मां बाप के अरमानों को भी पहचानो कोई भी बड़ा फैसला लेने से पहले दस बार सोचना या पीछे पलट कर अपने मां-बाप के चेहरे की ओर देखना और सोचना कि हमारे जाने के बाद इनके दिल पर क्या बीतेगी । ये सोचना कि दिन रात मेरी मां ने क्या नहीं किया मेरे लिए एक बार पीछे पलट कर देखना एक-एक उसके बलिदान का दृश्य आपके आंखों के आगे आएगा ।

About author 

Veena advani

वीना आडवाणी तन्वी
नागपुर , महाराष्ट्र


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