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Jitendra_Kabir, poem

जनता जाए भाड़ में- जितेन्द्र ‘कबीर’

जनता जाए भाड़ में देशभक्ति की आड़ मेंकुछ लोगों ने अपने लिए जुटाईसारी सुख-सुविधाएं,बाकी बची जनता सब वस्तुओं परटैक्स भर-भरकरझोंकती …


जनता जाए भाड़ में

जनता जाए भाड़ में- जितेन्द्र 'कबीर'

देशभक्ति की आड़ में
कुछ लोगों ने अपने लिए जुटाई
सारी सुख-सुविधाएं,
बाकी बची जनता सब वस्तुओं पर
टैक्स भर-भरकर
झोंकती रही खुद को भाड़ में।
राष्ट्रवाद की आड़ में
कुछ लोगों ने अपनी तानाशाही
सबके ऊपर चलाई,
बाकी बची जनता आपस में
लड़-झगड़कर
झोंकती रही खुद को भाड़ में।
जनसेवा की आड़ में
कुछ लोगों ने सिर्फ धनिकों के लिए
हितकारी नीतियां बनाई,
बाकी बची जनता अभावों से
निपट-निपटकर
झोंकती रही खुद को भाड़ में।
धर्म-रक्षा की आड़ में
कुछ लोगों ने इंसान-इंसान के बीच
जमकर नफरत फैलाई,
बाकी बची जनता उसकी आग में
जल-जलकर
झोंकती रही खुद को भाड़ में।

जितेन्द्र ‘कबीर’
यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है।
साहित्यिक नाम – जितेन्द्र ‘कबीर’
संप्रति-अध्यापक
पता – जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश
संपर्क सूत्र – 7018558314


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