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kishan bhavnani, poem

गड्डियों का पहाड़ घर में खड़ा किया हूं

भावनानी के भाव गड्डियों का पहाड़ घर में खड़ा किया हूं  अपने इतने सालों की मौजमस्ती वाली सेवा जिसमे रोज़ …


भावनानी के भाव

गड्डियों का पहाड़ घर में खड़ा किया हूं 

अपने इतने सालों की मौजमस्ती वाली
सेवा जिसमे रोज़ रात पार्टी लिया हूं
तारीख़ को रिटायर हो रहा हूं
गड्डियों का पहाड़ घर में खड़ा किया हूं

साथियों एजेंटों बिचौलियों से कह दिया हूं
मलाई वाली फाइलों को तारीख पहले बुलवाया हूं
तारीख को रिटायर हो रहा हूं
गड्डियों का पहाड़ घर में खड़ा किया हूं

आगे जिंदगी का क्या होगा सोच रहा हूं
पेंशन से काम नहीं चलेगा चिंतत हो रहा हूं
एशोआरम अय्याशी का आदि रहा हूं
गड्डियों का पहाड़ घर में खड़ा किया हूं

अभी मैं घर वालों सहित ठसन से जी रहा हूं
परिवार को सभी सुख सुविधाएं दे रहा हूं
मलाई बंदी से क्या होगा सोच रहा हूं
गड्डियों का पहाड़ घर में खड़ा किया हूं

मलाई बिना पेंशन से कैसे जिऊंगा सोच रहा हूं
ठसन सहित रुतबा छिनेगा घबरा रहा हूं
हरे गुलाबी के बल पर विकारों का आदि रहा हूं
गड्डियों का पहाड़ घर में खड़ा किया हूं

About author

कर विशेषज्ञ स्तंभकार एडवोकेट किशन सनमुख़दास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
कर विशेषज्ञ स्तंभकार एडवोकेट किशन सनमुख़दास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र 

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