Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

खिड़की का खुला रुख

मैं औरों जैसा नहीं हूँ आज भी खुला रखता हूँ अपने घर की खिड़की कि शायद कोई गोरैया आए यहाँ …


मैं औरों जैसा नहीं हूँ
आज भी खुला रखता हूँ
अपने घर की खिड़की
कि शायद कोई गोरैया आए
यहाँ अपना घोंसला बनाए।

मैं महसूस करना चाहता हूँ
वो सुन्दर बीते हुए पल
जब चिड़ियाँ अपनी चहचहाहट में
भर देती थीं दिनभर खुशियाँ
ना कोई तनाव, ना ईर्ष्या, घृणा
हर ओर शान्ति की छाया थी।

अब वो सब कुछ खो गया
जैसे खिड़की का घोंसला भी
उजड़ गया, टूट गया।

मैं फिर से पाना चाहता हूँ
वो सुनहरा समय
इसीलिए आज भी
खुली रखता हूँ अपनी खिड़की।

-प्रतीक झा ‘ओप्पी’ (उत्तर प्रदेश)


Related Posts

नम्र बनके रहो हर खुशहाल पल तुम्हारा है

March 4, 2023

भावनानी के भाव नम्र बनके रहो हर खुशहाल पल तुम्हारा है बुजुर्गों ने कहा यह जीवन का सहारा है सामने

धर्म और जाति की आड़ में छिपता हूं

March 4, 2023

भावनानी के व्यंग्यात्मक भाव धर्म और जाति की आड़ में छिपता हूं आज के बढ़ते ट्रेंड की ओर बढ़ रहा

हे परमपिता परमेश्वर

March 4, 2023

भावनानी के भाव हे परमपिता परमेश्वर आपके द्वारा दिए इस जीवन में इन मुस्कुराहटों का हम पर एहसान है हर

हे परवरदिगार मेरे मालिक

March 4, 2023

 भावनानी के भाव हे परवरदिगार मेरे मालिक मैंने कहा गुनहगार हूं मैं  उसने कहा बक्ष दूंगा  मैंने कहा परेशान हूं

कविता: भारतीय संस्कृति में नारी | bharatiya sanskriti me naari

February 16, 2023

 भावनानी के भाव कविता:भारतीय संस्कृति में नारी  भारतीय संस्कृति में नारी  लक्ष्मी सरस्वती पार्वती की रूप होती है समय आने

वैश्विक पटल पर भारत तीव्रता से बढ़ रहा है

February 16, 2023

 भावनानी के भाव वैश्विक पटल पर भारत तीव्रता से बढ़ रहा है रक्षा क्षेत्र में समझौतों के झंडे गाड़ रहे

PreviousNext

Leave a Comment