Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

खिड़की का खुला रुख

मैं औरों जैसा नहीं हूँ आज भी खुला रखता हूँ अपने घर की खिड़की कि शायद कोई गोरैया आए यहाँ …


मैं औरों जैसा नहीं हूँ
आज भी खुला रखता हूँ
अपने घर की खिड़की
कि शायद कोई गोरैया आए
यहाँ अपना घोंसला बनाए।

मैं महसूस करना चाहता हूँ
वो सुन्दर बीते हुए पल
जब चिड़ियाँ अपनी चहचहाहट में
भर देती थीं दिनभर खुशियाँ
ना कोई तनाव, ना ईर्ष्या, घृणा
हर ओर शान्ति की छाया थी।

अब वो सब कुछ खो गया
जैसे खिड़की का घोंसला भी
उजड़ गया, टूट गया।

मैं फिर से पाना चाहता हूँ
वो सुनहरा समय
इसीलिए आज भी
खुली रखता हूँ अपनी खिड़की।

-प्रतीक झा ‘ओप्पी’ (उत्तर प्रदेश)


Related Posts

दोनों बातें खतरनाक हैं- जितेन्द्र ‘कबीर’

December 8, 2021

 दोनों बातें खतरनाक हैं किसी परिवार का मुखियापरिवार के किसी सदस्य कीनाराजगी के डर सेचुप्पी साध लेता है जबअपने परिवार

सूनापन अखरता”- अनीता शर्मा

December 8, 2021

सूनापन अखरता अकेले चुपचाप खड़ी हो ,देख रही थी,जहाँ दुनिया बसती थी । सूनापन पसरा था कमरे में,जहाँ रौनक रहती

मंथरा- सुधीर श्रीवास्तव

December 8, 2021

 मंथरा आज ही नहीं आदि से हम भले ही मंथरा को दोषी ठहराते, पापी मानते हैं पर जरा सोचिये कि

मन- डॉ.इन्दु कुमारी

December 8, 2021

 मन रे मन तू चंचल घोड़ासरपट दौड़ लगाता हैलगाम धरी नहीं कसकेत्राहि त्राहि मचाने वाली जीवन की जो हरियालीपैरों तले

मेरा एक सवाल- विजय लक्ष्मी पाण्डेय

December 8, 2021

मेरा एक सवाल…!!! पढ़े लिखे काका भैया से,मेरा एक सवाल।माँ -बहनों की गाली से ,कब होगा देश आजाद.?? अरे !

उलझे-बिखरे सब”- अनीता शर्मा

December 8, 2021

उलझे-बिखरे सब” कितने उलझे-उलझे हुए सब , कितने बिखरे-बिखरे हुए सब। बनावटी दुनिया में उलझे हुए सब, दिखावटी सब सज-धज

Leave a Comment