Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Aalekh, Bhawna_thaker, lekh

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

“कोशिश करने वालों की हार नहीं होती” “नहीं झुकी ज़माने की जबर्दस्ती के आगेहवाओं के ख़िलाफ़ बहने वाली वामा हूँ, …


“कोशिश करने वालों की हार नहीं होती”

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

“नहीं झुकी ज़माने की जबर्दस्ती के आगे
हवाओं के ख़िलाफ़ बहने वाली वामा हूँ, मेरी सोच हर सीमाओं को लाँघकर भागे,
पढ़कर मेरी कहानी चाहती हूँ सोई हुई कुछ नारियों की आत्मा जागे”

सदियों से चली आ रही मानसिकता को तोड़ना आसान नहीं होता, पर हौसला बुलंद हो तो हार का ठप्पा हमारे हिस्से नहीं होता। कुछ साल पहले लड़कियों को अपनी मर्ज़ी से कुछ भी चुनने का अधिकार नहीं था, ऐसे में जीवनसाथी अपनी मर्ज़ी का चुनना और घरवालों को उसके लिए राज़ी करना लोहे के चने चबाने जैसा था।
पहले से शुरू करूँ तो दो भाई और दो बहनों में सबसे छोटी मैं थी, और जहाँ भाई बड़े होते है वहाँ छोटी बहन को कोई भी काम करने की आज़ादी कहाँ मिलती है। कपड़े की पसंद से लेकर हर बात में बंदीशें तय कर दी जाती है। मेरी बड़ी बहन ने समझौतों पर अपनी ज़िंदगी काट ली, पर मैं बचपन से ही विद्रोही स्वभाव की थी। अपनी ज़िंदगी अपने तरीके से जीने वाली। हर शौक़ को जबरदस्ती पालती, हर फैशन के कपड़े पहनती। पढ़ने में होशियार थी बारहवीं पास करके कालेज में एड़मिशन लेने की बात आई तो पहले ताउजी ने मेरे पापा को बोल दिया, लड़कियों को ज़्यादा पढ़ाकर क्या करना है? चूल्हा चौका ही तो संभालना है, हमारे खानदान में आजतक किसी लड़की ने कालेज की सीढ़ीयां नहीं चढ़ी लड़का ढूँढो और हाथ पीले करके जिम्मेदारी से मुक्ति पाओ। उस पर बड़े भैया जो कालेज के दूसरे साल में पढ़ाई कर रहे थे उन्होंने बोल दिया अगर छोटी कालेज आएगी तो मैं पढ़ाई छोड़ दूँगा, मेरे दोस्त क्या सोचेंगे, और कोई लड़का इसे छेड़ेगा तो मुझसे बरदाश्त नहीं होगा घर पर बैठे जो करना है करें।
मेरा दिमाग हिल गया ये कैसी मानसिकता लड़की होना कोई गुनाह हो गया? मैंने भी ठान ली थी पितृसत्तात्मक सोच, कुप्रथा और झूठी रवायतों के ख़िलाफ़ लड़ने की शुरुआत किसीको तो करनी ही पड़ेगी। मैंने पापा से साफ़ बोल दिया पापा अगर आप मुझे आगे पढ़ने की इजाज़त नहीं दे सकते तो अपने हाथों से मुझे कुएँ में धकेल दीजिए। मुझे जन्म ही क्यूँ दिया जब मेरा पालन पोषण इस निम्न सोच के साथ करना था। दो दिन तक भूख हड़ताल पर रही तीसरे दिन मेरी मम्मी ने भी मेरा साथ दिया और खुद भी खाना नहीं खाई और आख़िरकार घरवालों को अपने हक में फैसला करवा के रही।
पढ़ाई तो चल पड़ी पर घरवाले जैसे मेरा ग्रेजुएशन ख़त्म होने के इंतज़ार में ही थे, एक सरकारी मुलाजिम को तैयार ही रखा था मेरा हाथ थामने के लिए। मेरी मर्ज़ी नहीं पूछी गई फैसला सुनाया गया, की अगले महीने आनंद के साथ तुम्हारी सगाई है। मेरे विद्रोही मानस ने फिर सर उठाया क्यूँकि मुझे मेरे पैरों के उपर खड़ा होना था जिसके लिए आगे की पढाई जरूरी थी। मैंने पापा को बोल दिया बस तीन साल और दे दीजिए एमबीए कर लूँ फिर बिदा कर दीजिएगा। उस पर भी घर में धमासान हुआ पर अब शायद घरवाले समझ गए थे की ये राजधानी एक्सप्रेस है रुकने वाली नहीं, तो बस सबने हथियार ड़ाल दिए। एमबीए करके एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी भी ले ली अब मम्मी के धैर्य ने जवाब दे दिया बोली अब लड़के देखेगी या अब भी कोई शर्ते है तेरी। एक उम्र के रहते शादी हो जाए तो अच्छा है समझी। मैंने कहा ठीक है कोई ढंग का हो तो बताईये बैठ जाऊँगी मंडप में बैठ जाऊँगी।
भले मेरा किसीसे कोई प्रेम का चक्कर नहीं था पर चोईस तो मिलनी चाहिए की नहीं, ऐसे कैसे जो पहले मिला उसका हाथ थामकर चल पडूँ। इस बार माँ भी विपक्ष में थी बोली बेटा सरकारी नौकरी वाले लड़के आजकल मिलते ही नहीं, तेरा भविष्य सुरक्षित रहेगा हाँ बोल दे। मैंने कहा माँ मुझे ज़िंदगी किसके साथ बितानी है, एक इंसान के साथ या नौकरी के साथ? पसंद नापसंद नाम की भी कोई चीज़ होती है। मुझे नहीं पसंद ये लड़का, मुझे वैसे भी आगे पढ़ना है, और इस बीच कोई ढंग का लड़का मिल गया तो अपनी पसंद से शादी करना चाहूँगी।
मेरे इतना कहने पर घर में भूचाल आ गया। पापा ने कहा अगर यही गुल खिलाने है तो कोई जरूरत नहीं आगे पढ़ने की, रहना ज़िंदगी भर कुँवारी मैं अब तुम्हारे लिए लड़का ढूँढने भी कहीं नहीं जाने वाला। मैंने भी बोल दिया ठीक है फिर जो मेरी किस्मत में होगा मंज़ूर है, मुझे पर थोपी गई जबरदस्ती की सोच को बरदाश्त हरगिज़ नहीं करूँगी। मेरा भी कोई अस्तित्व है, पसंद नापसंद है। यही सारी बात मेरे भाइयों पर क्यूँ लागू नहीं होती? उनको अपनी ज़िंदगी के फैसले खुद लेने का अधिकार और सारी बंदीशें मेरे लिए ही क्यूँ। ताउजी ने भी बहुत हाथ पैर मार लिए मुझे अपनी बनाई दहलीज़ के भीतर कैद करने के लिए, पर मैं चंचल बहता आबशार थी हर बाधाएं लाँघकर हर रिवायतों को तोड़कर अपनी राह खुद कंड़ारती रही, जब तक अपनी पसंद का लड़का नहीं मिला नकार की मोहर लगाती रही। एक दिन बिलकुल मेरी कल्पनाओं में बसी तस्वीर से मिलता मेरी पसंद का अनमोल नगीना मेरे दर पर आया जी हाँ हमारे पड़ोसी शुक्ला अंकल का भतीजा इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करके कुछ दिनों के लिए उनके घर आया था। उस ज़माने में प्यार, इश्क, मोहब्बत करना पाप कहो या गुनाह माना जाता था। पर मुझे वो पहली नज़र में ही भा गया था तो मैंने अपनी माँ से कहा देखिए मम्मी लड़के इस जितेन जैसे होते है पढ़े लिखे और स्मार्ट, आपने अबतक ऐसा लड़का दिखाया जो मैं हाँ बोलू। मम्मी को मेरी बातों से पता चल गया की मुझे जितेन पसंद है, उन्होंने शुक्ला अंकल से बात करके बात आगे बढ़ाई। आज मैं अपनी पसंद के साथ हंसी खुशी ज़िंदगी बिता रही हूँ।
पर आज मेरे परिवार को मेरी सोच पर गर्व है, उनका दामाद इंजिनीयर है, और मुझे सर आँखों पर रखता है। “आफ्टर ऑल मेरी पसंद का जो है”
पर मेरी लड़ाई यहाँ समाप्त नहीं हुई बेशक पति के रुप में जितेन सौ टच का सोना थे पर ससुराल वालों की अठारहवीं सदी वाली सोच को इक्कीसवीं सदी में बदलना भी मेरे जिम्मे आया। शादी के पहले ही दिन दादी सास ने फ़रमान जारी कर दिया बड़े बुज़ुर्गो के सामने घूँघट निकाला करो बहू अरे जहाँ आज एक तरफ़ लड़कियां हवाई जहाज उड़ा रही है वहाँ इनको मुझसे घूँघट की अपेक्षा थी मैंने सोच लिया अगर कुप्रथा को पहले ही वार में खंडन नहीं किया तो लादी जाएगी। इसलिए मैंने दादी सास के पास बैठकर उनका हाथ हाथों में लेकर कहा दादी आपकी नज़रों में मर्यादा किसे कहते है बताईये? मर्यादा किसमें है घूँघट निकालने में या हंमेशा बड़ों की इज्जत करके उनकी सेवा करना अगर घूँघट निकालकर मैं आपके सामने ज़ुबान चलाऊँगी तो आपको अच्छा लगेगा या बिना घूँघट के भी ताउम्र आपकी सेवा करूँ वो। आपको मुझसे जिन संस्कारों की और मर्यादा की उम्मीद है वो मैं बिना घूँघट के भी पूरी करूँगी। और हाँ घूँघट तो मैं बिलकुल नहीं निकालूँगी। दादी के गले अब भी मेरी बातें उतर नहीं रही थी। खैर आगे जाकर समझ जाएंगे।
आज मेरे परिवार की खुली सोच का श्रेय मुझे देते हुए सब अपनी गलती कुबूल करते है तब अपने विद्रोही स्वभाव पर गर्व होता है। एक नई पहल का जीता जागता उदाहरण जो हूँ मैं। आज भी अपने लेखन के ज़रिए कुप्रथाओं का खंडन करते विद्रोह का अलख जगा रखा है। भले आप कामियाब न रहो पर हाथ जोड़ कर बैठे रहने से बेहतर है, हर गलत चीज़ को बदलने की कोशिश हंमेशा करनी चाहिए। साहिल पर बैठे रहने से नैया पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

About author

bhawna thaker

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु

Related Posts

चिड़िया मुक्त हुई – ट्विटर को खरीदने की डील पूरी हुई /Twitter deal-completed

October 30, 2022

 चिड़िया मुक्त हुई – ट्विटर को खरीदने की डील पूरी हुई  आओ निरंतर नवाचार और सीख़ने की आदत डालें  सभ्यता

लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की 147 वीं जयंती एकता दिवस पर विशेष/iron man sardar vallabhbhai patel 147 birth anniversary special

October 30, 2022

लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की 147 वीं जयंती एकता दिवस पर विशेष/iron man sardar vallabhbhai patel 147 birth anniversary

क्या गर्भपात नैतिक रूप से उचित है?| Is abortion morally justified?

October 29, 2022

 क्या गर्भपात नैतिक रूप से उचित है?|Is abortion morally justified? लैंगिक समानता के लिए गर्भपात का अधिकार महत्वपूर्ण है। अलग-अलग

हेट स्पीच| Hate speech

October 28, 2022

हेट स्पीच आओ हेट स्पीच, अनैतिक आचरण को जड़ से समाप्त करें आध्यात्मिकता, हेट स्पीच अनैतिक आचरण को दूर करने

भारतीय नोट पर मां लक्ष्मी गणेश/bhareey noto par ma lakshmi Ganesh

October 27, 2022

भारतीय नोट पर मां लक्ष्मी गणेश भारतीय मुद्रा पर मां लक्ष्मी गणेश के स्वरूप छापने के प्रस्तावित बयान पर शाब्दिक

समय का आगाज़ – ब्रिटेन में भारतवंशी का राज़(Rishi sunak)

October 26, 2022

समय को नतमस्तक समय का आगाज़ – ब्रिटेन में भारतवंशी का राज़ (Rishi sunak) भारतवंशी ब्रिटेन के 97 वें प्रधानमंत्री

Leave a Comment