Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem, Veena_advani

कमज़ोर तू मां | kamjor tu maa

कमज़ोर तू मां मेरा बेटा बोला मां कमज़ोर मां तू कहलाईअपने हक पर तू हक ना जताईतेरे लिखे शब्द में …


कमज़ोर तू मां

मेरा बेटा बोला मां
कमज़ोर मां तू कहलाई
अपने हक पर तू हक ना जताई
तेरे लिखे शब्द में दर्द ए चित्कार समाई।।

मैं बोली , बेटा आस और विश्वास
से आज भी चल रही मेरी लड़ाई।।

बेटा बोला , मां खत्म ना कर खुद को
अपने हक की आवाज़ क्यों ना उठाई
उठा आवाज हक की मैं तेरी परछाई
तेरी खुशी , हक की है ये मां लड़ाई।।

मैं बोली , बेटा तू बड़ा हो गया है
दर्द समझ मेरे संग खड़ा हो गया है
तू मरहम बन मेरी दवा हो गया है
मेरा दिल दुआ दे यादों में खो गया है।।

बेटा बोला कब तक आंसू बहाएगी
दर्द ए चित्कार यूं लिखती तू जाएगी
अपने जज़्बातों को दिल में दबाएगी
मां तू इंसान है ये कब समझ पाएगी।।

मैं बोली , ऊपर वाला इंसाफ करेगा
कब तक परीक्षा ले मेरी दर्द वो देगा
आस का दीपक फिर भी न बुझेगा
एक दिन हार वो ही खुशियां देगा।।

बेटा बोला , दस बरस से सब सहती
क्यों आखिर कुछ पिता को कहती
तेरी खुशियां हक पराई पिता से लेती
मां मेरी आंखें तुझे देख दर्द में बहती।।

मैं बोली , आवाज़ थी कभी मैंने उठाई
चरित्रहीन हूं मैं ये इल्ज़ाम पिता से पाई
इसलिए खामोशियों को हथियार बनाई
बेटा परवरिश के लिए तेरी चुप्पी भाई।।

बेटा बोला , मैं आत्मनिर्भर बन जाऊंगा
तेरे हर लम्हे मैं खुशियां से भर जाऊंगा
भाई , तुझे हसीन जिंदगी मैं दिलाऊंगा
इस इंसान को नजरंदाज कर जाऊंगा।‌।

सुन बेटे की बातें अपने सीने से लगाया
बेटा बडा हो गया ये दिल को समझाया
बेटा जानता कौन अपना कौन पराया
दिल सुकून पा लिख मरहम़ लगाया।।

About author 

Veena advani

वीना आडवाणी तन्वी
नागपुर , महाराष्ट्र

दर्द – ए शायरा


Related Posts

ईर्ष्या तू ना गई – डॉ. इन्दु कुमारी

April 18, 2022

ईर्ष्या तू ना गई देखकर लोगों की सुख-सुविधा जल रही तू खूब जलन सेअपनी दुख की चिंता नहीं हैदूसरों के

कर्म महान है – डॉ. इन्दु कुमारी

April 18, 2022

कर्म महान है बच्चे भगवान हैं शिक्षा हमारी आधार हैगुणवत्तापूर्ण है विकल्प शत प्रतिशत लागू करना शिक्षकों का है संकल्पऐसा

पहले जैसा नहीं रहा- अनिता शर्मा झाँसी

April 18, 2022

पहले जैसा नहीं रहा क्यों हर रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा ?हाँ सोचती हूँ मैं अक्सर ही कि-क्यों हर रिश्ता

ढलता सूरज- जयश्री बिरमी

April 18, 2022

ढलता सूरज मां हूं उगते सूरज और ढलते सूरज सीउगी तो मां थी विरमी तब भी मां ही थीजब हौंसले

कविता -रश्क- सिद्धार्थ गोरखपुरी

April 13, 2022

कविता -रश्क रश्क अंतस में पाले हुए हो हजारोंचैन की अहमियत बस तुम्हें ही पता हैबेचैनी भरा दिन कैसे है

हाशिये पर इतिहास- शैलेंद्र श्रीवास्तव

March 26, 2022

हाशिये पर इतिहास ब्रह्म राक्षसबहुत छल प्रपंची होता हैवह कितनो का अंतरंग होता हैवह न किसी धर्म न पंथ न

Leave a Comment