Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

lekh, Priyanka_saurabh

कन्या-पूजन नहीं बेटियों के प्रति दृष्टिकोण बदलने की जरूरत

कन्या-पूजन नहीं बेटियों के प्रति दृष्टिकोण बदलने की जरूरत नवरात्रि का पर्व नारी के सम्मान का प्रतीक है। नौ दिनों …


कन्या-पूजन नहीं बेटियों के प्रति दृष्टिकोण बदलने की जरूरत

कन्या-पूजन नहीं बेटियों के प्रति दृष्टिकोण बदलने की जरूरत

नवरात्रि का पर्व नारी के सम्मान का प्रतीक है। नौ दिनों तक नवदुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना होती है। कहते हैं कि जिस घर में माता की पूजा होता है, वह सुख-समृद्धि बनी रहती है। देवी पूजा महज माता की प्रतिमा की पूजा मात्र नहीं है, बल्कि यह पर्व मां, बहन, बेटी और समाज की हर नारी के सम्मान का पर्व है। ऐसे में सिर्फ कन्या पूजन ही नहीं, महिलाओं का भी सम्मान करें। अगर आप देवी पूजा करते हैं तो महज नवरात्रि के मौके पर नहीं बल्कि महिलाओं के प्रति आदर सदैव बनाए रखें। इन नवरात्रि देवी के सामने महिला सम्मान का संकल्प लें और अपने आचरण में कुछ बदलाव लाएं, ताकि मां, बेटी और समाज की हर नारी सुरक्षित व सम्मानित महसूस कर सके। आज जब सभी देशवासी भारत की संस्कृति का गौरवमय त्यौहार कन्या पूजन करने की तैयारी में हैं तो उनसे यह निवेदन और प्रश्न भी है कि आखिर जहां कन्या की सम्मानजनक स्थिति बने रहे, ऐसा समाज बनाने के लिए क्यों कुछ नहीं करते?

-प्रियंका सौरभ

नवरात्रि एक हिंदू पर्व है। नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘नौ रातें’। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों – महालक्ष्मी, महासरस्वती या सरस्वती और दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा होती है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। भारतीय नारीवादियों और आधुनिक भारतीय महिलाओं ने इस परित्यक्त देवी प्रतीकवाद पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है क्योंकि इसे पितृसत्तात्मक उत्पीड़न के एक सक्रिय उपकरण के रूप में भी इस्तेमाल किया गया है। अन्य संस्कृतियों और पौराणिक कथाओं में भी कुछ सबसे प्रमुख देवी माताएँ रही हैं और आदर्श मातृत्व के जीवन के प्रतीक हैं – उदाहरण के लिए, मिस्र के आइसिस, ग्रीक डेमेटर या कैथोलिक धर्म में, मैरी यीशु की माँ के रूप में। लेकिन किसी अन्य संस्कृति में छोटी लड़कियों को देवी के रूप में नहीं पूजा जाता जैसा कि भारत में किया जाता है। कई पश्चिमी नारीवादी और विश्व स्तर पर बहुत सारी महिलाएं हिंदू देवी-देवताओं को प्रेरणादायक और आंतरिक शक्ति प्रदान करने वाली मानती हैं।

नवरात्रों में भारत में कन्याओं को देवी तुल्य मानकर पूजा जाता है। पर कुछ लोग नवरात्रि के बाद यह सब भूल जाते हैं। कई जगह कन्याओं का शोषण होता है और उनका अपमान किया जाता है। नवरात्रि के आठवें और/या नौवें दिन जिन छोटी-छोटी पूर्व-यौवन लड़कियों की पूजा की जाती है, उनके साथ अक्सर दुर्व्यवहार और भेदभाव किया जाता है। ऐसे कई देवी मंदिर हैं जहां रजस्वला महिलाओं या कथित निचली जाति की महिलाओं को प्रवेश करने की भी मनाही है, देवी के बहुत सारे पूजा स्थल हैं जहां केवल पुरुषों को आंतरिक गर्भगृह में जाने की अनुमति है और महिलाओं को नहीं। नवरात्रि के आठवें और/या नौवें दिन कंजक या कन्या के रूप में पूजी जाने वाली छोटी पूर्व-यौवन लड़कियों को अक्सर बाकी दिनों के लिए लड़कियों के रूप में जन्म लेने के लिए गाली दी जाती है, उनके साथ भेदभाव किया जाता है और उन्हें ‘अपवित्र’ माना जाता है। मासिक धर्म शुरू होने के बाद उनकी पूजा की जानी चाहिए। आज भी भारत में बहूत सारे गांवों में कन्या के जन्म पर दुःख मनाया जाता है। कन्याओं और महिलाओं के प्रति हमें अपनी सोच बदलनी पड़ेगी। देवी तुल्य कन्याओं का सम्मान करें। इनका आदर करना ईश्वर की पूजा करने जितना ही पुण्य प्राप्त होता है। शास्त्रों में भी लिखा है कि जिस घर में स्त्रियों का सम्मान किया जाता है वहां भगवान खुद वास करते हैं।

बदलते दौर में देवी की समकालीन समझ की आवश्यकता है, यह देवी की अवधारणा में विविधता लाने का समय है। कुछ साल पहले, टैप रूट इंडिया ने एक अभियान विकसित किया जिसमें तीन मुख्य हिंदू देवियों – दुर्गा, सरस्वती, और लक्ष्मी की छवियों को प्रस्तुत किया गया था, लेकिन उनके चेहरे पर चोट और चोट के निशान थे जो महिलाओं के खिलाफ हिंसा का संकेत देते थे। अब समय आ गया है, हो सकता है कि देवी से संबंधित इन सभी प्रतीकों को वर्तमान वातावरण के अनुरूप फिर से कल्पना करने की आवश्यकता हो और छाती ठोकने वाली “जय माता दी, माता की जय” की देवी पूजा को यदि प्रतिस्थापित नहीं किया जाता है तो इसका लड़कियों और महिलाओं के लिए एक सुरक्षित और अधिक सम्मान करने की आवश्यकता है। आज जब सभी देशवासी भारत की संस्कृति का गौरवमय त्यौहार कन्या पूजन करने की तैयारी में हैं तो उनसे यह निवेदन और प्रश्न भी है कि आखिर जहां कन्या की सम्मानजनक स्थिति बने रहे, ऐसा समाज बनाने के लिए क्यों कुछ नहीं करते? केवल पुलिस के डंडों से नैतिकता नहीं संवरती, उसके लिए नैतिक प्रयास भी करने होंगे। इसके साथ ही आरक्षण द्वारा कुछ महिलाओं को पंचायत, निगमों या भविष्य में संसद या विधानसभाओं में भेजने पर भी महिलाएं तब तक सशक्त नहीं हो सकतीं, जब तक समाज में स्वस्थ वातावरण नहीं होगा।

बहुत से घरों में लड़कियों को वह स्थान और सम्मान नहीं जो परिवार के बेटों को है। हमारे समाज के कुछ प्रमुख व्यक्ति और राजनीतिक नेता भी केवल कागजी भाषण देने में तो शेर है, पर घर के अंदर प्रवेश करते ही या भूल जाते हैं कि बाहर महिला अधिकार के लिए क्या-क्या भाषण देकर आए हैं? कितना अफसोस है कि जो संविधान महिला को राष्ट्रपति बना सकता है वह किसी मंदिर की मुखिया नहीं बना सकता। आज भी कुछ मंदिर ऐसे हैं जहाँ महिलाओं को प्रवेश नहीं करने दिया जाता। परिवार के मुखिया पुरुष की मृत्यु के समय पगड़ी बेटियों के सिर पर रख दी जाती है। जब महिला की मृत्यु होती है उसकी बेटियां या बहू ऐसा अधिकार नहीं रखती जो बेटे या पति को रहता है। बहुत से समुदाय में तो बिरादरी में बाँधी जा रही पगड़ी को महिलाएं हाथ भी नहीं लगा सकती। देश के समाचार पत्रों में, टीवी चैनलों की खबरों के बुलेटिन के साथ एक दिन भी ऐसा नहीं जाता जब देश के किसी न किसी भाग में बालिग अथवा नाबालिग के साथ दुराचार का समाचार न मिले। समाचार मिलता है कि एक युवती का अपहरण हुआ और कार में ही उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म के बाद सड़क पर फेंक गए। इन समाचारों के अधिक उदाहरण देना आवश्यक नहीं, क्योंकि दुर्भाग्य से हमें प्रतिदिन यही सुनना और देखना पड़ता है।

कन्या पूजन के साथ हमें यह संकल्प लेना होगा कि जिस लड़की की हम पूजा कर रहे हैं मंदिर की पुजारी क्यों नहीं बन सकती? कम से कम जो देवियों के मंदिर है वहां की पूजा तो महिलाएं करें। इसमें तर्क भी है समाज सोचे तो सही? मंदिर के अध्यक्ष क्यों नहीं बन सकती? ढोलक बजा सकती है, लंगर पका सकती है। लेकिन कुछ विशेष मंदिरों में उसी देव मूर्ति के दर्शन नहीं कर सकती जिनके गीत गाकर वो गला फाड़ लेती है या उनके लिए खाना बना कर भोग लगाती है। याद रखना होगा कि समाज को तो मानसिकता बदलनी है ही पर पहले महिलाओं को मानसिकता बदलनी होगी। नवरात्रि का पर्व नारी के सम्मान का प्रतीक है। नौ दिनों तक नवदुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना होती है। कहते हैं कि जिस घर में माता की पूजा होता है, वह सुख-समृद्धि बनी रहती है। देवी पूजा महज माता की प्रतिमा की पूजा मात्र नहीं है, बल्कि यह पर्व मां, बहन, बेटी और समाज की हर नारी के सम्मान का पर्व है। ऐसे में सिर्फ कन्या पूजन ही नहीं, महिलाओं का भी सम्मान करें। अगर आप देवी पूजा करते हैं तो महज नवरात्रि के मौके पर नहीं बल्कि महिलाओं के प्रति आदर सदैव बनाए रखें। इन नवरात्रि देवी के सामने महिला सम्मान का संकल्प लें और अपने आचरण में कुछ बदलाव लाएं, ताकि मां, बेटी और समाज की हर नारी सुरक्षित व सम्मानित महसूस कर सके।

About author 

Priyanka saurabh

प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार
facebook – https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/

twitter- https://twitter.com/pari_saurabh 


Related Posts

लेखक और वक्ता समाज का आईना

August 28, 2022

“लेखक और वक्ता समाज का आईना” एक लेखक और वक्ता समाज का आईना होते है। समाज के हर मुद्दों पर

ताउम्र छटपटाती नारी के भीतर का ज्वालामुखी एक दिन चिल्ला -चिल्ला कर फूट पड़ा।

August 28, 2022

ज्वालामुखी ताउम्र छटपटाती नारी के भीतर का ज्वालामुखी एक दिन चिल्ला -चिल्ला कर फूट पड़ा। आख़िर कब तक तुम्हारी सोच

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन

August 28, 2022

आओ अपने पुराने दिनों को याद करें  कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन  वर्तमान प्रौद्योगिकी युग में भी मनीषियों

राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन 25-26 अगस्त 2022 संपन्न

August 28, 2022

श्रमेव जयते 2047  राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन 25-26 अगस्त 2022 संपन्न – श्रमिकों के कल्याण में मील का पत्थर साबित होगा 

खेल हमारे जीवन की आवश्यकता है|sports day special

August 28, 2022

खेल हमारे जीवन की आवश्यकता है प्राचीन काल से आधुनिक काल तक विभिन्न अवस्थाओं से गुजरे खेलों का आज भी

अवैध अतिक्रमण पूरे देश की एक गंभीर समस्या है।

August 26, 2022

अवैध अतिक्रमण पूरे देश की एक गंभीर समस्या है। सार्वजनिक भूमि के अतिक्रमण की रोकथाम में स्थानीय अधिकारियों और राज्य

Leave a Comment