Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Bhawna_thaker, poem

एहसास एक लड़की के

“एहसास एक लड़की के” दुनिया मेरे लिए ख़ौफ़ की बिहड़ नगरी है,अंधेरों से नहीं मुझे उजालों से डर लगता है, …


“एहसास एक लड़की के”

एहसास एक लड़की के
दुनिया मेरे लिए ख़ौफ़ की बिहड़ नगरी है,अंधेरों से नहीं मुझे उजालों से डर लगता है, दहलीज़ लाँघने से पहले सौ सलाहों से त्रस्त हूँ, घर से निकली मैं सही सलामत लौटूँगी या नहीं इस दहशत में माँ-बाबा के माथे की शिकन मुझे खोने से डरती है।

कैद कर लिया है मैंने खुद को खुद के भीतर, मेरे अनछुए तन को तकती है जब लोलूप नज़रें, तब महसूस होता है मानों असंख्य बिच्छू रेंगते है मेरी त्वचा की परत पर।

ये दुनिया मेरे लिए ख़ौफ़ की बिहड़ नगरी है, मेरे स्निग्ध तन के कलपुर्ज़े से लालायित होते नौंचने को दौड़ती है कुछ आँखें, ऐसा महसूस होता है जैसे आँखों से ही मेरा बलात्कार हो रहा है।

मेरी हर आहट को सूंघते आख़िर दुपट्टे के आरपार बिंध कर शर्म की हर परतें मुझे तितर बितर करने की कोशिश में खुद को मेरी नज़रों में गिरा लेते है।

कहाँ छिपाऊँ अपनी जवानी की तरन्नुम को, एक नज़र मुझ पर पड़ते ही हर नज़रों में बेकल सी बज उठती है,
जैसे मैं कोई नग्मा हूँ, क्यूँ हर कोई गुनगुनाते निकल जाता है या कोई उत्सव हूँ जो मनाते खुश हो जाते है।

क्यूँ मेरे तन के असबाब को नज़रों से लूट कर उनकी पेशानी पर लज्जा का बल नहीं पड़ता, सहस्त्र तृष्णाएं जन्म लेती है वहशियों की आँखों में मेरी आभा की रंगशाला की चकाचौंध से।

तो क्या हुआ की नाजुकता की डली हूँ,
मैं कोई ताजमहल या ऐतिहासिक स्मारक तो नहीं, जो मेरी रचना का हवस भरी नज़रों से निरूपण किया जाए।

गौरवर्ण अभिशाप है मीठी चाशनी सा, आकर्षित करते सीधे दरिंदों के मुँह से लार टपकने का मोहरा बनाता है, मैं अलकनंदा सी इठलाते कैसे चलूँ? मेरी कमर पर पड़ते हर बल पर कातिलों की नज़र है।

क्यूँ मुझे देखकर मूँद नहीं लेते अपनी आँखें, जैसे अपने घर की इज्जत को देख झुका लेते है मैं उनके नहीं किसी ओर के घर की इज्ज़त हूँ इसलिए?

About author

bhawna thaker

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु

Related Posts

कविता-डिजिटल युग का नया डॉक्टर

May 11, 2022

कविता-डिजिटल युग का नया डॉक्टर चिंतक कवि, एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र आजकल कृत्रिम बुद्धिमता की लहर छाई है

क्यूँ हम अच्छे नहीं बन सकते

May 11, 2022

“क्यूँ हम अच्छे नहीं बन सकते”  भावना ठाकर ‘भावु’  मानव में मनुष्यता के गुण विलुप्त होते जा रहे है, वहशीपन

कविता-उम्मीद

May 10, 2022

 उम्मीद  उदास रातों में उम्मीद की शमां जलाओ यारो  सन्नाटे की दीवारों पर खुशियां सजाओ यारो  फिर ये ख़ामोशी भी

घमासान

May 10, 2022

 घमासान क्यों हो रहीं हैं घुटन क्यों डर रहा हैं मन कहीं तो हो रहा हैं इंसानियत पर जुल्म घुट

वो ख्यालात मोहब्बत के

May 10, 2022

 वो ख्यालात मोहब्बत के तेरे तसव्वुर ए ख्यालात में अकसर दिल खोता है एसा लगे चांदनी रात में चांद चांदनी

बंद कमरों की घुटन-सुधीर श्रीवास्तव

May 9, 2022

 बंद कमरों की घुटन आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमने खुद ही खुद को कैद कर लिया है कंक्रीट के

Leave a Comment