कहूं कैसे
मिलूं तो होंठ सट जाते हैं ऐसे
रात के अधखिले फूल हो जैसे
चाहकर भी वे हिल नहीं पाते
फिर तुमसे मैं कुछ कहूं कैसे
पल-पल में झपकती है पलकें
इशारे में भी कहूं तो कैसे
कुछ सुनाने से पहले ही चले जाते
आखिर बात दिल की बताऊं कैसे
क्या होता है मेरे दिल में
दिल का हाल अपना सुनाऊं कैसे
तुम मेरे प्यार को समझते नादान
तुमसे सच्चा प्यार जताऊं कैसे
जाने तुम कैसे जी लेते हो
मैं जिऊं तो आखिर कैसे
दिल तो तुम्हारा भला लगता है
फिर तुम्हें बेवफा कहूं कैसे।
स्व रचित
डॉ. इन्दु कुमारी हिन्दी विभाग मधेपुरा बिहार






