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कहानी –कोख का बंटवारा

कहानी –कोख का बंटवारा Pic credit -freepik.com रामनरायण के दो बेटों का नाम रमेश और सुरेश है। युवा अवस्था में …


कहानी –कोख का बंटवारा

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Pic credit -freepik.com

रामनरायण के दो बेटों का नाम रमेश और सुरेश है। युवा अवस्था में रामनारायण के मृत्यु होने के बाद उनकी पत्नी रमादेवी ने रामनारायण के जमा पूंजी और पूर्वजों से मिली संपत्ति से दोनों बेटों का परिवरिश किया। रमादेवी का बड़ा बेटा रमेश पढ़ लिखकर शहर में सरकारी विभाग पर बड़े बाबू के पद पर आसीन हुआ तो छोटा बेटा सुरेश गांव में ही खेतीबाड़ी सहित अन्य सामाजिक कार्य करने लगा। एक भाई शहर में, तो दूसरा गांव में अपने परिवार के साथ रहने लगा। रमादेवी अपने छोटे बेटे सुरेश के साथ गांव में ही रहती थी। रमेश और सुरेश दोनों के रिश्ते सामान्य थे तथा दोनों एक दूसरे के भावनाओं का पूरा सम्मान करते थे। सुरेश कभी अपने बड़े भाई के सामने ऊंची आवाज में बात नहीं करता।
खैर दोनों भाई अपने-अपने तरीके से अपने परिवार के पालन पोषण में लगे रहे और दोनों के बच्चें पढ़ लिखकर शहर में नौकरी करने लगे। कुछ दिनों बाद रमेश भी रिटायर हो सरकारी विभाग से पेंशन लेने लगा और सुरेश गांव में ही रमेश से साथ आपसी रजामंदी से हुए बंटवारे में मिली अपने हिस्से की जमीन पर धन अर्जन का साधन बना अपना जीवन बिताने लगा।
कुछ सालों बाद अचानक एक दिन सुरेश को करोड़ों रुपए की लाटरी लग गई। ये बात जब रमेश को पता चला तो वह छोटे भाई के बदलते हालात देख बड़ा खुश हुआ, पर रमेश के बीवी और बच्चों को सुरेश के परिवार की ये खुशी फूटी आखें नही सुहाई और रमेश की बीवी, बच्चे रमेश को ताने देने लगे और सुरेश के साथ हुए बंटवारे को न मानने और उसपर सुरेश के द्वारा बनाई गई संपत्ति में हिस्सेदारी मांगने के साथ जयजाद के पुनः बंटवारे की बात को कहने लगे। पहले तो रमेश अपने बीवी बच्चों की बात नजरंदाज करता रहा। लेकिन आखिर में रमेश पर ये कहावत चरितार्थ हुई कि “जो किसी से सामने नही झुकता उसे उसके अपने झुका देते है।” अंतः रमेश भी अपने परिवार के दबाव में आ छोटे भाई सुरेश के साथ पूर्व में आपसी रजामंदी से हुए बंटवारे को ना मानते हुए उस पर सुरेश द्वारा बनाई गए चीजों में हिस्सा मांगने लगा। ये देख सुरेश ने रमेश से कहा भैया जैसे आपने अपने पूरे जीवन में नौकरी किया और अब आप सरकार से मिलने वाली लाखों रुपए के पेंशन के हकदार बने, वैसे मैंने भी अपना पूरा जीवन आपसी सहमति से हुए बंटवारे से अपने हिस्से में मिली जमीन पर इन चीजों का निर्माण करने में लगा दिया ताकि इसके होने वाले दो रुपए के आमदनी से मैं अपना जीवन बीता सकूं। रमेश की अंतरात्मा तो सुरेश के इन बातों को सही बता रही थी। पर बीवी और बच्चों के जिद्द के कारण रमेश इसे सहर्ष स्वीकार नहीं कर पा रहा था और पूर्व में हुए बंटवारे को मानने को तैयार नहीं हो रहा था। सुरेश भी अपनी कही बातों को बार-बार दुहराये जा रहा था। धीरे-धीरे इन बातों का सिलसिला बहस और झगड़े का रूप ले तेज ऊंची आवाज के साथ पूरे कमरे में गूंजने लगी।
होते शोर के बीच कमरे में एक किनारे बैठी इनकी मां रमादेवी अपने नम्र आंखों से ऊपर छत की तरफ देखते हुए ईश्वर से कह उठी “हे ! ईश्वर, ये तू संपत्ति का बंटवारा नही करवा रहा बल्कि मेरे कोख का बंटवारा करवा रहा है ।”

About author 

Ankur singh
अंकुर सिंह

हरदासीपुर, चंदवक
जौनपुर, उ. प्र. -222129.


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