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Mamta_kushwaha, poem

मुस्कुराना सीख रही

मुस्कुराना सीख रही मुस्कुराना सीख रही हूँ तुम्हारे बिना जीना सीख रही हूँहाँ आज फिर से मुस्कुराना सीख रही हूँजो …


मुस्कुराना सीख रही

मुस्कुराना सीख रही

मुस्कुराना सीख रही हूँ

तुम्हारे बिना जीना सीख रही हूँ
हाँ आज फिर से मुस्कुराना सीख रही हूँ
जो तुम्हारे जाने के साथ-साथ
चेहरे से चली गई थी ,
मानो तुम्हारे बिना
जिन्दगी की हर साज रूठ गयी
हाल ऐ मेरा क्या बताऊँ अब
बिना जल मछली जैसी तड़प मेरी
जो देखे मोहे देते सांत्वना मुझे ,

तुम्हारा ही नाम लेकर कहते
अगले जन्म तुम दोनों का साथ
होगा लम्बी आयु का, ना रहो मायूस
प्रियतम तेरा वापस आयेगा
खुशियों का रंग बिखेर देगा ,

लो देखो ना आज फिर से
मुस्कुराना सीख रही हूँ
कुछ इस तरह उदासी छिपा रही
और तुमसे किये वादें निभा रही
जो तुमने लिया था हमसे
हमेशा मुस्कुराते रहने का ,

गम हो या खुशियों का शाम
ना रखना उदासी चेहरे पर
तो कैसे भूल जाए ये वादें तुम्हारे
लो आज फिर से मुस्कुराना सीख रही
जिंदगी की हर साज अपना रही ।

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Mamta Kushwaha
ममता कुशवाहा

स्वरचित रचना
मुजफ्फरपुर, बिहार


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